“वोट की दुकान कहां है?” — बनारस में राजभर का सियासी विस्फोट

शालिनी तिवारी
शालिनी तिवारी

उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर सोमवार को वाराणसी दौरे पर थे। लेकिन यह दौरा प्रशासनिक कम और सियासी पटाखों से ज़्यादा भरा रहा।

हाल ही में मंत्री अनिल राजभर के बयान पर उठे विवाद को लेकर जब पत्रकारों ने सवाल किया, तो राजभर ने बिना लाग-लपेट के सीधा हमला बोला। उन्होंने कहा, “जो लोग मुझ पर वोट बेचने का आरोप लगाते हैं, अगर उन्होंने मां का दूध पिया है और मर्द हैं, तो बताएं वो दुकान कहां है जहां वोट बिकता है।”

उनका यह बयान सुनते ही सियासी गलियारों में हलचल तेज हो गई।

“जनता का वोट बोरी में नहीं होता” — राजभर का पलटवार

राजभर ने आगे कहा कि जनता का वोट किसी बोरे में भरकर नहीं बेचा जा सकता। उन्होंने खुद को निशाने पर लेने वालों पर तंज कसते हुए कहा कि, “23 साल पहले महाराजा सुहेलदेव का नाम लेने वाला कोई नहीं था। आज मेरी वजह से उनकी प्रतिमा लगी है, उनके नाम पर योजनाएं चल रही हैं।”

साथ ही उन्होंने आरोप लगाने वालों को लोहा चोरी तक का ताना दे डाला — बयान में सटायर भी था और संदेश भी।

शंकराचार्य विवाद पर दो टूक

शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद द्वारा योगी आदित्यनाथ के हिंदू होने के प्रमाण मांगने पर राजभर ने साफ कहा, “देश संविधान से चलता है, किसी के बयान से नहीं।”

गौ माता को राज्य माता का दर्जा देने के सवाल पर उन्होंने कहा कि यह मुद्दा कैबिनेट में आएगा तो चर्चा होगी — फिलहाल बयानबाज़ी से कुछ नहीं बदलेगा।

इस्तीफा या सियासी ड्रामा?

इस्तीफा देने वाले अलंकार अग्निहोत्री पर टिप्पणी करते हुए राजभर ने उसे “पूरी तरह ड्रामा” करार दिया। उन्होंने दावा किया कि “अग्निहोत्री समाजवादी पार्टी के संपर्क में हैं और राजनीति में एंट्री का रास्ता ढूंढ रहे हैं।”

UGC विवाद पर क्या बोले राजभर?

UGC नियमों को लेकर चल रहे विवाद पर राजभर ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ स्टे लगाया है, नियम रद्द नहीं किए। उन्होंने सवाल उठाया कि “कमेटी में 17 जनरल कैटेगरी के लोग थे, फिर भी बिल समझ क्यों नहीं पाए?”

राजभर ने दोहराया कि वह SC, ST, OBC समेत सभी वर्गों की लड़ाई लड़ते रहेंगे — चाहे सियासी कीमत कुछ भी हो।

राजभर का यह बयान सिर्फ बयान नहीं, बल्कि 2027 चुनाव से पहले पोजिशनिंग का संकेत है। तीखी भाषा, सामाजिक प्रतीकों का ज़िक्र और विपक्ष पर सीधा हमला — सब कुछ चुनावी मोड की आहट देता है।

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